कोठारिया के रावत साहब धर्मांगद जी ने अपनी तीसरी शादी आउवा मारवाड़ के ठाकुर उगम सिंह जी की पुत्री दुर्गा कुंवर से की। रावत साहब के चौथे पुत्र, रतन सिंह जी, आउवा के भानेज थे और उन्हें कुंचोली की जागीर प्राप्त हुई थी। किसी कारणवश रतन सिंह जी भीलवाड़ा के मंगरोप गांव पहुंचे। वहां, उन्होंने घोड़ों को बनास में पानी पिलाने के बाद उनके चारे के लिए जगह खोजी तो पास में एक आश्रम दिखाई दिया, जहां नाथ संप्रदाय के दरियाव नाथ जी महाराज की धूनी थी।
दरियाव नाथ जी ने रतन सिंह जी का स्वागत किया और घोड़ों के लिए चारा और पानी की व्यवस्था की। बातचीत के दौरान, रतन सिंह जी कुछ उदास दिखे। दरियाव नाथ जी ने इसका कारण पूछा तो रतन सिंह जी ने अपनी संतान न होने और अपने बाद ठिकाने के उतराधिकारी के न होने की चिंता व्यक्त की। इस पर दरियाव नाथ जी ने धूनी की भभूत और प्रसाद देकर आशीर्वाद दिया कि उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी।
साल भर बाद, रतन सिंह जी के घर एक पुत्र का जन्म हुआ, जिससे वे अत्यंत प्रसन्न हुए और दरियाव नाथ जी के पास मंगरोप पहुंचे। रतन सिंह जी दरियाव नाथ जी के आध्यात्मिक विचारों और ज्ञान से अत्यधिक प्रभावित हुए और उन्हें अपना गुरु मान लिया। दरियाव नाथ जी, जो नाथ संप्रदाय के सिद्ध योगी थे, की कृपा से पुत्र की प्राप्ति होने के कारण, गुरु भक्ति में रतन सिंह जी ने अपने पुत्र का नाम जोगी नाथ रखा। उन्होंने यह भी घोषणा की कि उनके सभी वंशज सिंह के स्थान पर नाथ का टाइटल अपने नाम के साथ लगाएंगे। तभी से रतन सिंह जी के वंशजों ने अपने नाम के साथ नाथ शब्द जोड़ लिया।
यह इतिहास नाथ चौहान वंश की गौरवशाली परंपरा और गुरु भक्ति का प्रतीक है।
चौहानों के गोत्राचार
- वंश – अग्निवंश
- वेद – सामवेद
- माता – ब्रह्मा गायत्री
- गोत्र – वत्स
- वृक्ष – आशापाल / श्रीखेजा (केवड़ा)
- नदी – चन्द्र भागा / सरस्वती
- पोलपात – दसोंदी
- इष्टदेव – अचलेश्वर महादेव
- देवता – शंकर
- कुल देवी – आशापुरा (शाकम्भरी)
- नगारा – विजयवर / रणजीत
- पशुधन पर – धनुष का निशान
- निशान – पीला / सफेद
- झण्डा – सूरज, चाँद, कटारी
- शाखा – कौमुद्री
- सूत्र – गोमिल गृह सूत्र
- प्रवर – और्व, च्यवन, भार्गव, जमदग्न्य, अप्नुवान
- शिक्षा – वाम
- पितृ – लोट जी
- पुरोहित – सनाढ्य (चन्दौरिया)
- भाट – रजोर
- धूणी – सांभर
- पहली देवी – कालिका
- दूसरी देवी – चामुण्डा
- तीसरी देवी – शाकम्भरी
- चौथी देवी – आशापुरा
- भैरू – काल भैरव
- गढ़ – रणथम्भौर
- नाई – हंसवाल (पूरबिया)
- गुरु – वशिष्ठ
- कुल देवी का मूल स्थान – नाडोल
- तीर्थ – पुष्कर क्षेत्र
- प्रणाम – जय आशापुरी
- पक्षी – कपोत
- शाखाएँ – 24
- शस्त्र – तलवार
- प्रमुख गढ़ी – पहले अजमेर फिर दिल्ली
- ऋषि – शाण्डिल्य
- धर्म – वैष्णव व शाक्त
- कुल देवता – श्रीकृष्ण
- उपवेद – गन्धर्व वेद
- पाट – वाम
- शस्त्र पूजन – खांडा (तलवार)
- नोबत – कालिका
- निकास गढ़ी – विविध या विदेश