🌿 नाथ चौहान इतिहास 🌿

कोठारिया के रावत साहब धर्मांगद जी ने अपनी तीसरी शादी आउवा मारवाड़ के ठाकुर उगम सिंह जी की पुत्री दुर्गा कुंवर से की। रावत साहब के चौथे पुत्र, रतन सिंह जी, आउवा के भानेज थे और उन्हें कुंचोली की जागीर प्राप्त हुई थी। किसी कारणवश रतन सिंह जी भीलवाड़ा के मंगरोप गांव पहुंचे। वहां, उन्होंने घोड़ों को बनास में पानी पिलाने के बाद उनके चारे के लिए जगह खोजी तो पास में एक आश्रम दिखाई दिया, जहां नाथ संप्रदाय के दरियाव नाथ जी महाराज की धूनी थी।

दरियाव नाथ जी ने रतन सिंह जी का स्वागत किया और घोड़ों के लिए चारा और पानी की व्यवस्था की। बातचीत के दौरान, रतन सिंह जी कुछ उदास दिखे। दरियाव नाथ जी ने इसका कारण पूछा तो रतन सिंह जी ने अपनी संतान न होने और अपने बाद ठिकाने के उतराधिकारी के न होने की चिंता व्यक्त की। इस पर दरियाव नाथ जी ने धूनी की भभूत और प्रसाद देकर आशीर्वाद दिया कि उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी।

साल भर बाद, रतन सिंह जी के घर एक पुत्र का जन्म हुआ, जिससे वे अत्यंत प्रसन्न हुए और दरियाव नाथ जी के पास मंगरोप पहुंचे। रतन सिंह जी दरियाव नाथ जी के आध्यात्मिक विचारों और ज्ञान से अत्यधिक प्रभावित हुए और उन्हें अपना गुरु मान लिया। दरियाव नाथ जी, जो नाथ संप्रदाय के सिद्ध योगी थे, की कृपा से पुत्र की प्राप्ति होने के कारण, गुरु भक्ति में रतन सिंह जी ने अपने पुत्र का नाम जोगी नाथ रखा। उन्होंने यह भी घोषणा की कि उनके सभी वंशज सिंह के स्थान पर नाथ का टाइटल अपने नाम के साथ लगाएंगे। तभी से रतन सिंह जी के वंशजों ने अपने नाम के साथ नाथ शब्द जोड़ लिया।

✨ यह इतिहास नाथ चौहान वंश की गौरवशाली परंपरा और गुरु भक्ति का प्रतीक है।